“100 साल में RSS का एक भी अल्पसंख्यक या दलित प्रमुख क्यों नहीं?” — संजय सिंह का तीखा सवाल

नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) की राष्ट्रवाद की अवधारणा पर बड़ा हमला बोला है। एक पुस्तक चर्चा के दौरान बोलते हुए संजय सिंह ने आरएसएस के समावेशी होने के दावों पर सवाल उठाए और पूछा कि अपने 100 साल के इतिहास में संगठन ने देश की विविधता का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं किया।

संजय सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे, राष्ट्रवाद की परिभाषा और देश में बढ़ती नफरत की राजनीति पर खुलकर अपनी बात रखी।

1. “RSS के 100 साल और नेतृत्व का सवाल”

संजय सिंह ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) नाम से काफी विराट और सेवाभावी संगठन लगता है, लेकिन इसके शीर्ष नेतृत्व में देश के बहुसंख्यक और वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व गायब है।

  • अल्पसंख्यकों और महिलाओं की अनदेखी: उन्होंने सवाल उठाया कि 15-20% आबादी वाले मुस्लिम समुदाय, सिख या ईसाई समाज से आज तक आरएसएस का कोई प्रमुख (सरसंघचालक) क्यों नहीं बना? [[02:02]]

  • दलित, आदिवासी और OBC प्रतिनिधित्व: देश की 50% महिला आबादी, 10 करोड़ से अधिक आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों में से भी किसी को आरएसएस का प्रमुख नहीं बनाया गया [[02:29]]।

  • “संकुचित सोच का संगठन”: उन्होंने कहा कि इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि यह एक विशेष सोच और संकुचित मानसिकता का संगठन है जो अपनी विचारधारा को पूरे देश पर थोपना चाहता है [[03:05]]।

2. राष्ट्रवाद का पैमाना: मजदूर बनाम कॉरपोरेट

संजय सिंह ने भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस द्वारा तय किए गए “राष्ट्रवाद के पैमाने” पर कड़ा ऐतराज जताया:

  • मेहनतकश नागरिक सच्चा राष्ट्रवादी: उन्होंने तर्क दिया कि देश का गरीब मजदूर, किसान और कुली जो दिन-रात पसीना बहाकर अपने परिवार का पेट पालता है, वह सच्चा देशभक्त है—भले ही उसे अंग्रेजी, संस्कृत या वंदे मातरम के सभी श्लोक न आते हों [[03:53]]।

  • बैंक डिफॉल्टर्स पर तंज: उन्होंने कहा कि बैंकों का लाखों करोड़ रुपये डकारने वाले और धोखाधड़ी करने वाले लोग अगर अंग्रेजी बोल लें या वंदे मातरम के श्लोक सुना दें, तो उन्हें राष्ट्रवादी मान लिया जाता है, जो कि राष्ट्रवाद का बेहद संकुचित और विकृत नजरिया है [[04:22]]।

3. ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला

संजय सिंह ने मंच से ऐतिहासिक संदर्भों और किताबों का हवाला देते हुए आरएसएस की भूमिका पर सवाल खड़े किए:

  • तिरंगे से परहेज: डॉ. के.बी. हेडगेवार के पत्रों के संग्रह ‘पत्र रूप व्यक्ति दर्शन’ का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि 1930 में आरएसएस ने अपने स्वयंसेवकों को 26 जनवरी को तिरंगे की बजाय ‘भगवा ध्वज’ फहराने का निर्देश दिया था [[05:46]]। उन्होंने आरोप लगाया कि संघ मुख्यालय पर 52 सालों तक तिरंगा नहीं फहराया गया [[06:45]]।

  • राष्ट्रगान पर रुख: उन्होंने संघ की पत्रिका ‘ऑर्गेनाइजर’ के 28 दिसंबर 1949 के अंक का जिक्र करते हुए दावा किया कि इसमें राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां लिखी गई थीं [[07:27]]।

4. “नफरत की बुनियाद पर आगे नहीं बढ़ सकता देश”

संजय सिंह ने देश में धर्म और विचार थोपने की प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए कहा:

“दुनिया का कोई भी मुल्क नफरत की बुनियाद पर आगे नहीं बढ़ सकता। सभी धर्म इंसानियत, करुणा और भाईचारे का संदेश देते हैं, लेकिन झगड़ा तब शुरू होता है जब एक-दूसरे पर अपनी चीजें थोपी जाती हैं।” [[10:02], [12:08]]

उन्होंने कहा कि वास्तविक मुद्दे—जैसे 1 लाख से अधिक स्कूलों का बंद होना, बेरोजगारी, पेपर लीक और अस्पतालों की बदहाली—पीछे छूट रहे हैं और जनता का ध्यान भटकाने के लिए नफरती नैरेटिव गढ़े जा रहे हैं [[11:53]]। उन्होंने संघ प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान की सराहना भी की जिसमें उन्होंने कहा था कि मुसलमानों के बिना भारत की कल्पना नहीं की जा सकती, लेकिन सलाह दी कि इस सोच को जमीनी हकीकत में भी बदलना होगा [[10:22]]।