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अंबानी-अडानी समेत 21 मीडिया समूहों ने प्राइवेसी कानून को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती, पत्रकारिता की आजादी पर उठाए सवाल

नई दिल्ली: भारत के डिजिटल प्राइवेसी कानून को लेकर केंद्र सरकार और मीडिया संस्थानों के बीच कानूनी बहस तेज हो गई है। मुकेश अंबानी के Network18, गौतम अडानी से जुड़े NDTV और अन्य बड़े मीडिया समूहों सहित 21 समाचार प्रकाशकों ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून (Digital Personal Data Protection Act) के कुछ प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

मीडिया समूहों का तर्क है कि कानून के कुछ नियम खोजी पत्रकारिता, भ्रष्टाचार से जुड़े खुलासों और पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं। उनका कहना है कि यदि पत्रकारों को किसी व्यक्ति की निजी जानकारी पर रिपोर्ट तैयार करने से पहले उसकी सहमति लेनी पड़े, तो जांच से जुड़े सबूत मिटाए जाने या गवाहों पर दबाव डाले जाने का खतरा पैदा हो सकता है।

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा और सार्वजनिक हित में जानकारी सामने लाने के अधिकार के बीच संतुलन को लेकर बहस चल रही है।

क्या है पूरा मामला?

मीडिया संस्थानों की ओर से यह याचिका 6 अक्टूबर 2026 को दाखिल की गई थी। इसमें डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून के उन प्रावधानों को चुनौती दी गई है, जिन्हें प्रकाशकों के मुताबिक पत्रकारिता के काम में बाधा डालने वाला माना जा सकता है।

इस मामले में Digital News Publishers Association (DNPA) के माध्यम से 21 समाचार प्रकाशकों ने अपनी चिंताएं रखी हैं। प्रकाशकों की मांग है कि कानून के विवादित प्रावधानों को रद्द किया जाए या उनमें जरूरी बदलाव किए जाएं, ताकि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के साथ-साथ सार्वजनिक हित में रिपोर्टिंग करने का अधिकार भी सुरक्षित रहे। मामले की सुनवाई 27 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में होने की जानकारी दी गई थी। अदालत का अंतिम फैसला और याचिका पर आगे की कार्रवाई इस विवाद की दिशा तय करेगी।

प्राइवेसी कानून से पत्रकारों को क्या परेशानी हो सकती है?

मीडिया संस्थानों की प्रमुख चिंता सहमति यानी कंसेंट से जुड़ी है। उनका कहना है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितता या अन्य कथित गड़बड़ियों की जांच करते समय पत्रकारों को कई बार निजी डेटा और दस्तावेजों का इस्तेमाल करना पड़ता है।

यदि रिपोर्टिंग से पहले संबंधित व्यक्ति को इसकी सूचना देना या उसकी सहमति लेना अनिवार्य हो जाए, तो जांच की गोपनीयता प्रभावित हो सकती है। प्रकाशकों के अनुसार, जांच के दायरे में आया व्यक्ति सबूत नष्ट कर सकता है, गवाहों को प्रभावित कर सकता है या जानकारी सामने आने से रोकने की कोशिश कर सकता है।

हालांकि, यह मीडिया समूहों की ओर से उठाई गई आशंका है। कानून का उद्देश्य व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा करना है, लेकिन विवाद इस बात पर है कि पत्रकारिता और सार्वजनिक हित के मामलों में इन नियमों को किस तरह लागू किया जाना चाहिए।

क्या खबरें हटाने के लिए भी मजबूर होना पड़ सकता है?

मीडिया संस्थानों ने कानून के तहत डेटा मिटाने के अधिकार को लेकर भी चिंता जताई है। उनके मुताबिक, यदि कोई व्यक्ति अपनी सहमति वापस लेकर व्यक्तिगत जानकारी हटाने की मांग करता है, तो कुछ परिस्थितियों में प्रकाशित खबरों को हटाने या उनमें बदलाव करने का दबाव बन सकता है।

इसका असर उन रिपोर्टों पर पड़ने की आशंका जताई गई है, जिनमें किसी सार्वजनिक अधिकारी, कारोबारी या संस्था से जुड़े तथ्यों का खुलासा किया गया हो।

पत्रकारों और प्रकाशकों का तर्क है कि यदि हर ऐसे मामले में डेटा हटाने की मांग को प्राथमिकता दी गई, तो सार्वजनिक हित से जुड़ी महत्वपूर्ण खबरें अधूरी हो सकती हैं या उन्हें प्रकाशित रखना मुश्किल हो सकता है।

दूसरी ओर, व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा का उद्देश्य लोगों की निजी जानकारी के दुरुपयोग को रोकना है। अदालत के सामने चुनौती इन दोनों हितों के बीच उचित संतुलन तय करने की होगी।

पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों पर भी चिंता

खोजी पत्रकारिता में कई बार जानकारी ऐसे लोगों से मिलती है, जो अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं करना चाहते। भ्रष्टाचार, कॉरपोरेट अनियमितताओं और चुनावी गड़बड़ियों से जुड़े मामलों में व्हिसलब्लोअर यानी अंदरूनी जानकारी देने वाले लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

मीडिया समूहों का कहना है कि कानून के कुछ प्रावधानों के तहत सरकार संबंधित संस्थाओं से व्यक्तिगत डेटा से जुड़ी जानकारी मांग सकती है। उन्हें आशंका है कि पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं होने पर ऐसी शक्तियों का इस्तेमाल पत्रकारों के गोपनीय स्रोतों की पहचान तक पहुंचने के लिए किया जा सकता है।

यदि जानकारी देने वाले लोगों को अपनी पहचान उजागर होने का डर रहेगा, तो वे पत्रकारों से संपर्क करने से बच सकते हैं। इससे सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों में जानकारी जुटाने और उनकी पुष्टि करने की प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका है।

सरकार को मिले अधिकारों पर भी सवाल

मीडिया प्रकाशकों ने कानून के तहत सरकार को दिए गए कुछ अधिकारों पर भी आपत्ति जताई है। उनकी चिंता है कि व्यक्तिगत डेटा संभालने वाले संगठनों से जानकारी मांगने की व्यापक शक्तियों के साथ पर्याप्त स्पष्ट सीमाएं और स्वतंत्र सुरक्षा उपाय होने चाहिए।

याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि जब सरकारी संस्थाओं को कुछ व्यापक छूट मिल सकती है, तो पत्रकारिता के लिए समान स्तर की स्पष्ट सुरक्षा क्यों नहीं होनी चाहिए।

यह मुद्दा केवल समाचार संस्थानों तक सीमित नहीं है। इसका संबंध इस बात से भी है कि सार्वजनिक हित में काम करने वाले संगठनों को व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा के नियमों का पालन करते हुए अपनी जिम्मेदारियां कैसे निभानी चाहिए।

डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून क्या है?

Digital Personal Data Protection Act, 2023 का उद्देश्य डिजिटल माध्यम से एकत्र और इस्तेमाल किए जाने वाले व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए नियम तय करना है। यह कानून व्यक्तियों की निजी जानकारी के इस्तेमाल, सहमति और डेटा से जुड़े अधिकारों के लिए एक कानूनी ढांचा तैयार करता है।

इस कानून के तहत व्यक्तिगत डेटा संभालने वाली संस्थाओं पर कुछ जिम्मेदारियां लागू होती हैं। नियमों का पालन नहीं करने पर निर्धारित परिस्थितियों में कार्रवाई और आर्थिक दंड का प्रावधान भी है।

हालांकि, कानून के कुछ प्रावधानों को लेकर पहले भी सवाल उठे हैं। आलोचकों का कहना है कि निजी जानकारी की सुरक्षा सुनिश्चित करते समय सूचना के अधिकार, पारदर्शिता और खोजी पत्रकारिता पर पड़ने वाले प्रभावों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

प्राइवेसी बनाम प्रेस की आजादी: आगे क्या?

इस मामले का मुख्य सवाल यह है कि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा और स्वतंत्र पत्रकारिता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। एक ओर नागरिकों को अपनी निजी जानकारी की सुरक्षा का अधिकार है, तो दूसरी ओर पत्रकारिता सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही सुनिश्चित करने और अनियमितताओं को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

यदि अदालत मीडिया समूहों की दलीलों से सहमत होती है, तो कानून के कुछ प्रावधानों में बदलाव या उनके इस्तेमाल की सीमाओं को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश सामने आ सकते हैं। यदि याचिका खारिज होती है, तो प्रकाशकों को मौजूदा कानूनी ढांचे के भीतर अपनी प्रक्रियाओं को व्यवस्थित करना पड़ सकता है।

फिलहाल इस मामले में अंतिम निर्णय को लेकर निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और सरकार के पक्ष से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा करते हुए खोजी पत्रकारिता, गोपनीय स्रोतों और सार्वजनिक हित में जानकारी प्रकाशित करने के अधिकार को किस तरह संरक्षित किया जा सकता है।

News Desk

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