
महाराष्ट्र SIR पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, वोटर लिस्ट से नाम कटने के आरोपों पर चुनाव आयोग से मांगा जवा
महाराष्ट्र SIR News: महाराष्ट्र में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग समेत चार पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत में याचिका दाखिल कर दावा किया गया कि राज्य में लाखों मतदाताओं के नाम हटने से उनके मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है। मामले की अगली सुनवाई 5 नवंबर 2026 को होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने किन पक्षों को जारी किया नोटिस?
सोमवार, 26 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने महाराष्ट्र में SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने केंद्रीय निर्वाचन आयोग, केंद्र सरकार, महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग और महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा।
यह याचिका अरुण आनंदगिरी की ओर से दायर की गई है। याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद पी. दातार ने दलील दी कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटाए गए हैं। याचिका में इस प्रक्रिया की समीक्षा करने और मतदाताओं के हितों की सुरक्षा की मांग की गई है।
महाराष्ट्र में 33 फीसदी वोटरों के नाम कटने का दावा
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया कि महाराष्ट्र में लगभग 33 फीसदी मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। पुणे और कुछ अन्य क्षेत्रों में यह आंकड़ा करीब 40.6 फीसदी तक होने का दावा भी किया गया।
हालांकि, इन आंकड़ों को याचिका में उठाए गए आरोपों के रूप में समझना जरूरी है। महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के अनुसार, SIR के बाद प्रकाशित मसौदा मतदाता सूची में कुल 9,78,54,049 पंजीकृत मतदाताओं में से 2,06,88,487 नाम शामिल नहीं थे। यह कुल मतदाताओं का लगभग 21.14 फीसदी है।
निर्वाचन अधिकारियों के मुताबिक, संबंधित मतदाताओं को उनके दर्ज पते पर नहीं खोज पाने के कारण ये नाम मसौदा सूची में शामिल नहीं किए गए। अब विवाद इस बात पर है कि इस प्रक्रिया में वास्तविक मतदाताओं के नाम भी छूटे हैं या नहीं।
मुंबई-पुणे में पुनर्विकास परियोजनाओं से बढ़ी चिंता
याचिकाकर्ता के वकील ने मुंबई और पुणे में चल रही पुनर्विकास परियोजनाओं का मुद्दा भी उठाया। दलील दी गई कि दोनों शहरों में लगभग 3,500 पुनर्विकास परियोजनाएं चल रही हैं, जिनके कारण पुरानी इमारतों को तोड़ा जा रहा है और हजारों परिवारों को अस्थायी रूप से दूसरी जगह रहना पड़ रहा है।
ऐसी स्थिति में मतदाताओं के पते बदलने या निर्धारित पते पर उपलब्ध नहीं होने के कारण उनके नाम मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं। याचिका में इस आशंका को गंभीर बताते हुए कहा गया कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में ऐसे लोगों के मामलों की उचित जांच होनी चाहिए।
यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी व्यक्ति का अस्थायी रूप से घर बदलना और उसका मतदान का अधिकार समाप्त होना दो अलग-अलग बातें हैं। ऐसे मामलों में मतदाता सूची की शुद्धता और पात्र मतदाताओं के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
फॉर्म-6 को लेकर भी उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान फॉर्म-6 का मुद्दा भी उठा। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि जिन लोगों के नाम पहले से मतदाता सूची में दर्ज थे, उन्हें दोबारा नाम जुड़वाने के लिए नए मतदाता पंजीकरण वाले फॉर्म-6 का इस्तेमाल करने को कहना उचित नहीं है।
उनकी मांग थी कि पहले से पंजीकृत रहे लेकिन पुनरीक्षण के दौरान सूची से बाहर हुए मतदाताओं के लिए अलग प्रक्रिया या उपयुक्त फॉर्म की व्यवस्था की जानी चाहिए। उनका तर्क था कि इससे मतदाताओं को अनावश्यक परेशानी से बचाया जा सकता है और गलत घोषणा से जुड़ी आशंकाएं भी दूर हो सकती हैं।
हालांकि, इस मामले में निर्वाचन आयोग का पक्ष सामने आना बाकी है। अदालत ने फिलहाल इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है।
समयसीमा बढ़ाने की मांग पर अदालत ने क्या कहा?
याचिकाकर्ता ने दावे और आपत्तियां दाखिल करने की समयसीमा बढ़ाने के साथ-साथ अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने पर रोक लगाने की मांग भी की। उनका कहना था कि जब तक मामले की सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक पहले से मतदाता सूची में शामिल रहे लोगों के नाम हटाने की प्रक्रिया पर रोक लगाई जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल समयसीमा बढ़ाने का आदेश देने से इनकार कर दिया। पीठ ने संकेत दिया कि यदि सुनवाई के दौरान यह सामने आता है कि कुछ पात्र मतदाता जरूरी दस्तावेज दाखिल नहीं कर पाए हैं और उन्हें अतिरिक्त समय देने की जरूरत है, तो अदालत इस पर विचार कर सकती है।
इसका अर्थ है कि समयसीमा बढ़ाने की मांग पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
कब जारी होगी महाराष्ट्र की अंतिम मतदाता सूची?
महाराष्ट्र में SIR की प्रक्रिया के तहत दावे और आपत्तियां दाखिल करने की समयसीमा पहले संशोधित की गई थी। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, दावों और आपत्तियों के निपटारे की प्रक्रिया 10 नवंबर 2026 तक जारी रहेगी। अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन 16 नवंबर 2026 के लिए निर्धारित किया गया है।
अब 5 नवंबर को होने वाली सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर नजर रहेगी। अदालत के सामने निर्वाचन आयोग का जवाब आने के बाद यह स्पष्ट हो सकता है कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के आरोपों पर आगे क्या कदम उठाए जाएंगे और समयसीमा में किसी बदलाव की जरूरत है या नहीं।
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने मामले में नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों, फॉर्म-6 के इस्तेमाल और समयसीमा बढ़ाने जैसे मुद्दों पर अंतिम निर्णय आना बाकी है।
