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दिल्ली हाईकोर्ट में सौरव दास-आशुतोष रांका ने वापस ली याचिका, नेहा बोरा की अर्जी पर कल सुनवाई

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट में बुधवार, 21 अक्टूबर को CJP कार्यकर्ताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की हिरासत से जुड़े मामले में सुनवाई हुई। अदालत में हुई बहस के दौरान बॉन्ड की शर्तों, जमानतदारों को अस्वीकार किए जाने और स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) के आदेशों को चुनौती देने के कानूनी विकल्पों पर सवाल उठे। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने याचिका वापस लेने का फैसला किया।

वहीं, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा की 10,000 रुपये के शांति बॉन्ड से जुड़े नोटिस को चुनौती देने वाली याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार सुबह 10:30 बजे सुनवाई करने की बात कही।

हाईकोर्ट ने पूछा- दूसरे कानूनी विकल्प रहते सीधे यहां क्यों आए?

सौरव दास और आशुतोष रांका की ओर से वकील अभिक चिमनी ने 14 और 19 अक्टूबर को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेशों को रद्द करने की मांग की थी। याचिका में हिरासत बढ़ाने के आदेशों और जमानतदारों को खारिज किए जाने से जुड़े मुद्दे उठाए गए थे।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने बार-बार पूछा कि जब कानून में अपील और अन्य वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हैं, तो याचिकाकर्ता सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट क्यों पहुंचे। अदालत ने संकेत दिया कि जमानतदारों को अस्वीकार करने या मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने के लिए उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जा सकता है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 के तहत उसकी समीक्षा का दायरा मुख्य रूप से यह देखने तक सीमित है कि उचित प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं। तथ्यों और सबूतों का विस्तृत आकलन अपीलीय मंच का विषय हो सकता है।

बॉन्ड उल्लंघन और जमानतदारों को लेकर क्या हुई बहस?

सुनवाई में यह मुद्दा भी उठा कि दोनों कार्यकर्ताओं ने पहले शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड दिया था और बाद में उसके उल्लंघन का आरोप लगा। हाईकोर्ट ने पूछा कि ऐसी स्थिति में कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई और जमानतदारों को खारिज करने के फैसले को चुनौती देने के लिए अपील का रास्ता क्यों नहीं चुना गया।

याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि हिरासत बढ़ाने का आदेश मनमाना था और प्रक्रिया का उचित तरीके से पालन नहीं किया गया। उन्होंने जमानतदारों को बार-बार अस्वीकार किए जाने पर भी सवाल उठाए।

दूसरी ओर, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने लिखित जवाब और अपनी दलीलें रखने का अवसर दिया गया था, लेकिन उन्होंने जवाब दाखिल नहीं किया।

अदालत ने कहा कि बॉन्ड के कथित उल्लंघन और जमानतदारों से जुड़े पहलुओं पर संबंधित मजिस्ट्रेट को उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया के तहत विचार करना चाहिए। याचिका वापस लिए जाने के बाद अदालत ने मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर भी उठे सवाल

सुनवाई के दौरान जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और बॉन्ड की शर्तों से जुड़े घटनाक्रम पर भी चर्चा हुई। अदालत ने 10 अक्टूबर को हुए प्रदर्शन, 11 अक्टूबर को बॉन्ड दिए जाने, 12 अक्टूबर को जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए अधिसूचित क्षेत्र से हटाए जाने और 13 अक्टूबर को दोनों कार्यकर्ताओं के वहां पहुंचने से जुड़े घटनाक्रम पर सवाल किए।

हाईकोर्ट ने बैरिकेड तोड़कर आगे बढ़ने के आरोपों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि बैरिकेड लगाने के पीछे सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने का उद्देश्य होता है। अदालत ने यह भी सवाल किया कि जब किसी स्थान पर प्रदर्शन की अनुमति या अधिसूचित स्थिति को लेकर विवाद हो, तो संबंधित आदेश पर रोक लगी थी या नहीं।

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है, जब जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के अधिकार, पुलिस की कार्रवाई और शांति बनाए रखने के लिए जारी बॉन्ड की कानूनी प्रक्रिया को लेकर बहस चल रही है।

नेहा बोरा की याचिका पर कल सुनवाई

AISA अध्यक्ष नेहा बोरा ने दिल्ली पुलिस की ओर से जारी उस नोटिस को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का निजी बॉन्ड और एक जमानतदार देने के संबंध में जवाब देने को कहा गया था।

यह नोटिस भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 के तहत जारी किया गया था। बोरा की याचिका में नोटिस को रद्द करने और पुलिस को उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने से रोकने की मांग की गई है।

बोरा के वकील ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि मामले की सुनवाई 24 अक्टूबर से पहले की जाए, क्योंकि उन्हें स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने भी पेश होना था। इस पर हाईकोर्ट ने याचिका को गुरुवार सुबह 10:30 बजे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की बात कही।

आगे क्या होगा?

सौरव दास और आशुतोष रांका की याचिका वापस लिए जाने के बाद उनके मामले में संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष उपलब्ध प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। वहीं, नेहा बोरा की याचिका पर हाईकोर्ट की अगली सुनवाई में शांति बॉन्ड के नोटिस को चुनौती देने से जुड़े सवालों पर विचार किया जाएगा।

अदालत की ओर से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन कार्यवाहियों में उठाए गए कानूनी सवालों पर अंतिम निष्कर्ष को लेकर अभी कोई व्यापक फैसला घोषित नहीं किया गया है।

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