बिहार की राजनीति में एक दौर ऐसा भी रहा, जब चुनावी मैदान में पार्टियों के साथ-साथ बाहुबल और आपराधिक छवि वाले नेताओं की भी खूब चर्चा होती थी। कुछ नेताओं ने जेल में रहते हुए चुनाव लड़ा, तो कुछ विधायक और सांसद बनने के बाद भी कानूनी मामलों में घिरे रहे। वक्त बदला, सरकारें बदलीं और बिहार की राजनीति में इन नेताओं की भूमिका भी बदलती गई।
इस कहानी में पांच ऐसे नाम हैं, जिनका बिहार की सियासत में लंबे समय तक प्रभाव रहा—रामा सिंह, सूरजभान सिंह, आनंद मोहन सिंह, काली पांडेय और पप्पू यादव। इनमें से कुछ ने राजनीतिक विरासत अपने परिवार को सौंपी, कुछ ने अपनी पहचान दोबारा बनाने की कोशिश की और कुछ आज भी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं।
यहां इन नेताओं के राजनीतिक सफर के साथ उन प्रमुख आपराधिक मामलों का भी जिक्र है, जिनकी वजह से वे चर्चा में रहे। ध्यान रहे कि आरोप, मुकदमे और अदालत से हुई दोषसिद्धि अलग-अलग बातें हैं।
बिहार के वैशाली जिले से आने वाले रामा सिंह का नाम उन नेताओं में शामिल रहा है, जिनकी राजनीति के साथ बाहुबली छवि भी जुड़ी रही। उनका शुरुआती राजनीतिक सफर आसान नहीं था। 1990 और 1995 के विधानसभा चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरने के बाद उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
साल 2000 में रामा सिंह जनता दल यूनाइटेड के टिकट पर महनार विधानसभा सीट से विधायक बने। इसके बाद 2005 के दोनों विधानसभा चुनावों में लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर जीत दर्ज की। उनके चुनावी सफर का एक चर्चित पहलू यह भी रहा कि उन्होंने जेल में रहते हुए चुनाव लड़ने की बात कही जाती है।
2014 के लोकसभा चुनाव में रामा सिंह ने वैशाली सीट से चुनाव जीतकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह बनाई। इस चुनाव में उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह को हराया था।
हालांकि, उनका राजनीतिक सफर विवादों से अलग नहीं रहा। छत्तीसगढ़ के कारोबारी जयचंद वैद्य के अपहरण से जुड़े मामले में रामा सिंह ने 2016 में सरेंडर किया था। बाद में 2017 में उन्हें इस मामले में बरी कर दिया गया।
इसी साल उनके बेटे राजीव की सड़क हादसे में मौत हो गई। 2020 में रामा सिंह ने आरजेडी का रुख किया। उनके इस कदम से रघुवंश प्रसाद सिंह नाराज हुए और उन्होंने पार्टी छोड़ दी। बाद में रामा सिंह की पत्नी बीना सिंह महनार से विधायक बनीं। 2024 में रामा सिंह ने आरजेडी से भी दूरी बना ली।
उनका राजनीतिक सफर बताता है कि बिहार में चुनावी समीकरण, पार्टी बदलने और स्थानीय प्रभाव की राजनीति किस तरह एक-दूसरे से जुड़ी रही है।
सूरजभान सिंह बिहार के उन नेताओं में गिने जाते हैं, जिनका नाम 1990 के दशक में बाहुबल की राजनीति के साथ खूब चर्चा में रहा। उनके बारे में उस दौर में हथियारों और रेलवे ठेकों से जुड़े प्रभाव की बातें कही जाती थीं। हालांकि, ऐसे दावों को संबंधित मामलों और प्रमाणित तथ्यों के आधार पर ही देखा जाना चाहिए।
सूरजभान सिंह ने राजनीति में प्रवेश के बाद विधायक और फिर सांसद तक का सफर तय किया। उनकी पहचान केवल चुनावी जीत तक सीमित नहीं रही, बल्कि बिहार की उस राजनीति से भी जुड़ी रही जिसमें स्थानीय प्रभाव और शक्ति प्रदर्शन की चर्चा आम थी।
समय के साथ उनकी सक्रिय चुनावी भूमिका में बदलाव आया। उन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए परिवार के सदस्यों को भी राजनीति में आगे किया। उनकी पत्नी वीणा देवी लोकसभा सांसद रह चुकी हैं, जबकि परिवार के दूसरे सदस्य भी राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं।
सूरजभान सिंह का नाम बिहार के चर्चित बाहुबलियों की सूची में अक्सर लिया जाता है। हालांकि, आज की राजनीति में उनकी भूमिका को समझने के लिए उनके पुराने प्रभाव और वर्तमान सक्रियता के बीच अंतर करना जरूरी है।
बिहार के पूर्व सांसद आनंद मोहन सिंह की कहानी इस सूची में सबसे गंभीर कानूनी मामलों में से एक से जुड़ी है। उनका नाम गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी जी कृष्णैया की हत्या के मामले में सामने आया था।
5 दिसंबर 1994 को मुजफ्फरपुर में गैंगस्टर छोटन शुक्ला की शवयात्रा निकल रही थी। इसी दौरान उस रास्ते से गुजर रहे जी कृष्णैया की भीड़ ने हत्या कर दी। मामले में आनंद मोहन पर भीड़ को उकसाने का आरोप लगा और बाद में उन्हें दोषी ठहराया गया।
आनंद मोहन का राजनीतिक सफर भी काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा। वह 1990 में जनता दल के टिकट पर महिषी विधानसभा सीट से विधायक बने। 1993 में उन्होंने बिहार पीपुल्स पार्टी बनाई और 1996 में शिवहर से लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बने।
इस मामले में 2007 में निचली अदालत ने आनंद मोहन को मौत की सजा सुनाई थी। बाद में पटना हाईकोर्ट ने सजा को उम्रकैद में बदल दिया और सुप्रीम कोर्ट ने भी उम्रकैद की सजा बरकरार रखी।
अप्रैल 2023 में बिहार सरकार ने जेल नियमों में बदलाव किया, जिसके बाद आनंद मोहन को 27 अप्रैल 2023 को सहरसा जेल से रिहा कर दिया गया। यह रिहाई राष्ट्रपति की ओर से दी गई माफी के कारण नहीं हुई थी, बल्कि राज्य सरकार के जेल नियमों में बदलाव और रिहाई के फैसले के तहत हुई थी।
इस फैसले को जी कृष्णैया की पत्नी उमा देवी ने चुनौती दी। जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस मामले ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी कि गंभीर अपराधों में दोषी ठहराए गए लोगों की समयपूर्व रिहाई के लिए बनाए गए नियमों का इस्तेमाल किस तरह किया जाना चाहिए।
गोपालगंज के काली पांडेय का नाम भी बिहार की पुरानी बाहुबली राजनीति के साथ जुड़ा रहा है। उन्हें कई समर्थक ‘शेर-ए-बिहार’ कहकर संबोधित करते थे। उनकी राजनीतिक पहचान ऐसे दौर में बनी, जब बिहार के कई इलाकों में स्थानीय ताकत और चुनावी प्रभाव का बड़ा महत्व था।
28 अक्टूबर 1946 को जन्मे काली पांडेय 1980 में गोपालगंज से विधायक बने। उनके राजनीतिक जीवन में एक हत्या के मामले में जेल जाने की घटना भी चर्चा में रही। इसके बाद उनकी छवि को लेकर राजनीतिक हलकों में कई तरह की बातें होने लगीं।
1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में देशव्यापी लहर थी। इसी चुनाव में काली पांडेय ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जेल में रहते हुए चुनाव लड़ा और कांग्रेस उम्मीदवार नगीना राय को हराकर लोकसभा पहुंचे। इस जीत ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में पहचान दिलाई।
बाद में वह कांग्रेस में शामिल हुए और राजीव गांधी के दौर में पार्टी के साथ काम किया। 1989 में नगीना राय पर हुए बम हमले के बाद उनका नाम भी चर्चा में आया था, लेकिन किसी आरोप को अदालत में दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं माना जा सकता।
काली पांडेय का नाम पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन के साथ भी राजनीतिक चर्चाओं में लिया जाता रहा। बाद के वर्षों में उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी में भूमिका निभाई और 2020 में कांग्रेस में लौटकर कुचायकोट विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन जीत हासिल नहीं कर सके।
22 अगस्त 2025 को दिल्ली में उनका निधन हो गया। उनके राजनीतिक जीवन में चुनावी जीत, जेल में रहते हुए चुनाव लड़ने और बदलते राजनीतिक समीकरणों की कई कहानियां जुड़ी रहीं।
बिहार की राजनीति में पप्पू यादव का नाम आज भी जाना-पहचाना है। उनका असली नाम राजेश रंजन है। समर्थकों के बीच उनकी पहचान एक ऐसे नेता की रही है, जो जरूरतमंदों की मदद करने और सीधे जनता के बीच पहुंचने का दावा करते हैं। इसी वजह से उनके समर्थक उन्हें कई बार ‘रॉबिनहुड’ की छवि से जोड़ते हैं।
दूसरी ओर, उनके राजनीतिक जीवन में कई विवाद और आपराधिक मुकदमे भी रहे हैं। 1990 के दशक में पप्पू यादव बिहार की राजनीति में तेजी से उभरे। बाद में उनका नाम कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के विधायक अजीत सरकार की हत्या के मामले में सामने आया।
14 जून 1998 को पूर्णिया में अजीत सरकार की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में पप्पू यादव को निचली अदालत ने 2008 में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हालांकि, मई 2013 में पटना हाईकोर्ट ने पर्याप्त सबूतों के अभाव में उनकी दोषसिद्धि रद्द करते हुए उन्हें बरी कर दिया। इसलिए इस मामले में हाईकोर्ट के फैसले को ध्यान में रखना जरूरी है।
पप्पू यादव ने अपने राजनीतिक सफर में अलग-अलग दलों के साथ काम किया और कई बार चुनाव जीते। उनकी राजनीति का आधार पूर्णिया और आसपास के इलाकों में रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में पूर्णिया सीट से जीत दर्ज की।
उनकी राजनीतिक यात्रा इस बात का उदाहरण है कि बिहार में किसी नेता की सार्वजनिक छवि केवल विवादों से नहीं, बल्कि चुनावी प्रदर्शन, स्थानीय समर्थन और जनता के बीच उसकी मौजूदगी से भी बनती है।
1990 के दशक और 2000 के शुरुआती वर्षों में बिहार की राजनीति में बाहुबल, जातीय समीकरण और स्थानीय दबदबे की चर्चा प्रमुखता से होती थी। कई नेताओं ने इसी माहौल में अपनी राजनीतिक जमीन बनाई। कुछ ने विधायक और सांसद के रूप में लंबा सफर तय किया, जबकि कुछ की राजनीति कानूनी मामलों और जेल से जुड़ी घटनाओं के कारण प्रभावित हुई।
2005 के बाद बिहार में कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर नई राजनीतिक बहस शुरू हुई। हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि उस समय के बाद बाहुबल की राजनीति पूरी तरह खत्म हो गई। इसकी भूमिका, तौर-तरीके और राजनीतिक प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों में बदलते रहे।
इन पांच नेताओं की कहानियां बिहार की राजनीति के उस दौर को समझने का एक नजरिया देती हैं, जिसमें चुनावी ताकत, सामाजिक आधार, आपराधिक आरोप और कानूनी फैसले अक्सर एक साथ चर्चा में आते रहे।
नोट: इस लेख का उद्देश्य किसी नेता या आपराधिक गतिविधि का महिमामंडन करना नहीं है। आरोपों और दोषसिद्धि के बीच अंतर करना जरूरी है। किसी भी व्यक्ति की कानूनी स्थिति का आकलन संबंधित मामले में अदालत के अंतिम फैसले के आधार पर किया जाना चाहिए।
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